जनतातीय दर्शन पर लिखा गया साहित्य ही आदिवासी साहित्य

आदिवासी साहित्य पर राष्ट्रीय सेमिनार संपन्न,15सूत्री घोषणा पत्र पेश
रांची,15जून। आदिवासी साहित्य की बुनियादी शर्त है उसमें आदिवासी दर्शन के तत्त्वों का होना है। जिस साहित्य में प्रकृति की लय-ताल और संगीत का अनुसरण नहीं हो, संपूर्ण जीव जगत की अवहेलना हो, जो धनलोलुप और बाजारवादी हिंसा और लालसा का नकार नहीं करे, जहां सहानुभूति, स्वानुभूति की बजाय सामूहिक अनुभूति का प्रबल स्वर-संगीत हो और जो मूल आदिवासी भाषाओं में नहीं रचा गया हो वह आदिवासी साहित्य नहीं है। आदिवासी साहित्य के इस घोषणा के साथ दो दिवसीय आदिवासी दर्शन और समकालीन आदिवासी साहित्य विषयक राष्ट्रीय सेमिनार आज संपन्न हुआ। 15 सूत्री घोषणा को सेमिनार में उपस्थित देश भर से आए आदिवासी रचनाकारों ने नगाड़ा और मेज बजाकर समर्थन किया।
सेमिनार के समापन पर आदिवासियों की ओर से भारतीय साहित्य और समाज को दिए गए अपने संदेश में वरिष्ठ आदिवासी कवयित्री ग्रेस कुजूर ने कहा कि आदिवासी समाज न अपनी औरतों का अपमान करता है और न ही उनके साथ हिंसा से पेश आता है। वह दुनिया में सहअस्तित्व और सहजीविता का सबसे बड़ा पैरोकार है। लेकिन हिंसा और गैर बराबरी के खिलाफ डटकर खड़े इस आदिवासी समाज को ही खत्म करने की कोशिश हो रही है। इस आदिवासी दर्शन को विस्थापित करके दुनिया को बचाया नहीं जा सकता है।
आदिवासी साहित्य की अखघ द्वारा आयोजित दो दिवसीय सेमिनार के दूसरे दिन आदिवासी साहित्य सृजन में कविता सृजन और शोध की स्थिति पर खासतौर से बातें हुई। संगोष्ठी के पहले सत्र में आदिवासी लेखक महादेव टोप्पो ने अपने लेखकीय जीवन के अनुभव साझा किए। उन्होंने कहा कि आदिवासी जीवन के कवियों ने पूरे हिंदी समाज को बहुत गहरे प्रभावित किया है।
इसके बाद आदिवासी कवियों ने अपनी कविताएं सुनाई। इन कविताओं का पाठ इतना प्रभावी था कि श्रोता पूरी तल्लीनता से उन्हें सुन रहे थे। इस मौके पर ग्रेस कुजूर ने आग, एक और जनी शिकार शीर्षक कविता का पाठ किया वहीं शांति खलखो ने बस स्टैंड वाली लघ्की, ज्योति लकघ ने बांस बखार, लोहा, जसिन्ता ने सुगना की कब्र और मडुघ का अंकूर, वंदना टेटे ने हमारे बच्चे नहीं जानते तोतो रे मोने रे, अनुज लुगुन ने कनरोआ और जंगल संथाल कविता का पाठ किया। इस मौके पर सुषमा असुर और महादेव टोप्पो ने भी अपनी कविता पघ । यशेादा मुर्मु की कविता अभिषेक पांडेय, बाटरु सोनवरो और उज्जवला ज्योति तिग्गा की कविताएं अंतेन टोप्पनो ने पघ । इन दोनों का संचालन डॉ शांति खलखो ने किया।
इसके बाद के सत्र में वंदना टेटे ने आदिवासी जीवन दर्शन पर सारगर्भित वक्तव्य दिया। इसी सत्र में युवा कवि अनुज लुगुन ने समकालीन आदिवासी कविताओं के संदर्भ में कुछ बहुत ही महत्वपूर्ण और विचारोत्तेजक बातें कही। उन्होंने बताया कि जल, जंगल, जमीन का सवाल आदिवासी कवि जब अपनी कविता में उठाता है तो यूं ही नहीं, अपितु वह पूरी तरह से उस कल्चर को आत्मसात कर रहा होता है। उन्होंने रामदयाल मुंडा की चर्चा करते हुए कहा कि एक स्पष्ट दार्शनिक भाव भूमि उनकी रचनाओं में आती है। ज्योति लकड़ा ने आदिवासी कविता की रुपगत और शैलीगत बुनावट का विस्तार से वर्णन करते हुए कहा कि कविताएं बिना किसी लाग- लपेट के अपनी बात कहती हैं। इसकी बड़ी वजह उनका सरल सादगी पूर्ण जीवन है। इस पूरे सत्रा का संचालन जसिन्ता केरकेट्टा ने कहा। संचालन के क्रम में उन्होंने कहा कि आदिवासी लिखने वाली नई पीघ की कविताओं में एक आक्रोश झलकता है।
अंतिम सत्र को संबोधित करते हुए विनोद कुमार ने कहा कि हम उस जमात के सदस्य हैं जो यह मानकर चलते हैं कि आदिवासी संस्कृति और समाज आदिम समाज नहीं है, उससे भिन्न सभ्यता और संस्कृति का समाज है। विकास की अवधारणा की चर्चा करते हुए विनोद ने कहा कि यह भी दो तरह का होता है। एक साम्यवादी तरीका है जो वर्गीकृत होकर समाज को चार हजार, पांच हजार पुरानी संस्कृति बताते हैं। उनके समानांतर आदिवासी संस्कृति खघ है। इस अंतर को भी समझने की जरुरत है। जिसे अंबेडकर जैसे लोग भी नहीं समझ सके और आदिवासियों को असभ्य व जंगली मानते रहे।
दिल्ली विश्वविद्य्नालय से आए डॉ बन्ना राम मीणा ने कहा कि आदिवासियों के बारे में जिस तरह की अफवाहें फैलायी जाती रहीं हैं। उसे मैंने दिल्ली में रहकर करीब से जाना-देखा है। श्री मीणा ने वीर भारत तलवार और ब्रह्मदेव शर्मा का उल्लेख करते हुए कहा कि जो गैरआदिवासी एक्टिविस्ट रहे हैं उनको खारिज नहीं किया जाए, ऐसे अंतरविरोध पाटे जाने चाहिए। बीच के सत्रों में रांची और विभिन्न विश्वविद्य्नालयों के शोध छात्र-छात्राओं सहित अन्य कई शोधार्थियों ने आदिवासी जीवन दर्शन, उनकी विभिन्न जातीय व भाषायी स्थितियों पर अपने पत्रों का वाचन किया।
इसके बाद जसिन्ता केरकेट्टा और सावित्री बघईक ने दो दिवसीय सेमिनार का सार निष्कर्ष सुनाया। समापन के ठीक पहले वंदना टेटे ने आदिवासी साहित्य का 15 सूत्राी रांची घोषणा जारी किया। सेमिनार के आखिरी सत्रा का संचालन विश्वभारती शांति निकेतन के आदिवासी साहित्यकार और प्राध्यापक डा. धनेश्वर मांझी ने किया। सम्मेलन में आदिवासी साहित्य का रांची घोषणा-पत्र भी पेश किया गया। आदिवासी साहित्य की बुनियादी शर्त उसमें आदिवासी दर्शन का होना है जिसके मूल तत्त्व हैं –
1. प्रकृति की लय-ताल और संगीत का जो अनुसरण करता हो.
2. जो प्रकृति और प्रेम के आत्मीय संबंध और गरिमा का सम्मान करता हो.
3. जिसमें पुरखा-पूर्वजों के ज्ञान-विज्ञान, कला-कौशल और इंसानी बेहतरी के अनुभवों के प्रति आभार हो.
4. जो समूचे जीव जगत की अवहेलना नहीं करें.
5. जो धनलोलुप और बाजारवादी हिंसा और लालसा का नकार करता हो.
6. जिसमें जीवन के प्रति आनंदमयी अदम्य जिजीविषा हो।
7. जिसमें सृष्टि और समष्टि के प्रति कृतज्ञता का भाव हो.
8. जो धरती को संसाधन की बजाय मां मानकर उसके बचाव और रचाव के लिए खुद को उसका संरक्षक मानता हो.
9. जिसमें रंग, नस्ल, लिंग, धर्म आदि का विशेष आग्रह न हो.
10. जो हर तरह की गैर-बराबरी के खिलाफ हो.
11. जो भाषाई और सांस्कृतिक विविधता और आत्मनिर्णय के अधिकार पक्ष में हो.
12. जो सामंती, ब्राह्मणवादी, धनलोलुप और बाजारवादी शब्दावलियों, प्रतीकों, मिथकों और व्यक्तिगत महिमामंडन से असहमत हो.
13. जो सहअस्तित्व, समता, सामूहिकता, सहजीविता, सहभागिता और सामंजस्य को अपना दार्शनिक आधार मानते हुए रचाव-बचाव में यकीन करता हो.
14. सहानुभूति, स्वानुभूति की बजाय सामूहिक अनुभूति जिसका प्रबल स्वर-संगीत हो.
15. मूल आदिवासी भाषाओं में अपने विश्व॰ष्टिकोण के साथ जो प्रमुखतः अभिव्यक्त हुआ हो.

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