प्रकृति पर्व करमा पर उत्साह व उमंग में डूबे लोग

रांची,12सितंबर। प्रकृति पर्व करमा आज राज्यभर में श्रद्धा, उल्लास और उमंग के साथ मनाया जा रहा है। राजधानी रांची के सभी पूजा स्थलों को करमा पर्व को लेकर आकर्षक तरीके से सजाया-संवारा गया है। जनजातीय तथा क्षेत्रीय भाषा विभाग में आज पांरपरिक रीति-रिवाज के साथ पूजा की गयी।
राजधानी के छोटानागपुर ब्लू क्लब करमटोली, हरमू सरना समिति सहजानंद चौक, चडरी, रांची महिला कॉलेज, आदिवासी छात्रावास, मोरहाबादी, कडरु बस्ती, पिस्कामोड़, बजरा, हेहल, हटिया, धुर्वा समेत अन्य अखड़ों में जनजातीय समाज और सदान मिलकर इस त्योहार को मना रहे है। पूजा पर बैठने वाले श्रद्धालुआें ने आज उपास रखा, वहीं शाम में मुहल्ले के युवा गीत गाते करम डाल काटे और रात में पूजा एवं कथा का आयोजन हुआ। केंद्रीय सरना समिति द्वारा जारी निर्देश के आलोक में करम की डाली विधि-विधान से काटी गयी और सभी अखड़ों में साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखा गया था, वहीं आधुनिक गीतों के बजाय अखड़ों में पारंपरिक गीत-संगीत, पारंपरिक वाद्य्न यंत्र व नगाड़ों आदि के संगीत पर लोग झूमते नजर आये। इस बार एक मौजा में एक ही अखड़ा में करम गाड़े गये ।
करमा की पूर्व संध्या पर जनजातीय भाषा विभाग में सांस्कृतिक कार्यक्रम का भी आयोजन किया गया। इस मौके पर रांची विश्वविद्य्नालय में जनजातीय भाषा विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. करमा उरांव ने बताया कि रांची के सरना नवयुवक संघ के छात्र-छात्राओं के लिए वर्ष 1987 में करम पूर्व संध्या समारोह शुरु किया गया था, आहिस्ता-आहिस्ता इस तरह के कार्यक्रम देश के विभिन्न शहरों के साथ-साथ विदेशों में भी होने लगे और इससे विश्व में करमा एवं सरहुल को पहचान मिली।
भादो एकादमशी को करमा पर्व मनाया जाता है, यह पर्व झारखंड के आदिवासी व मूलवासी सभी मिलकर मनाते है। जनजातीय समुदाय के लोग सरहुल में अच्छी बारिश के लिए पूजा करते है, जबकि करमा में बीज अच्छी तरह अंकुरित हो और उसमें कीड़े न लगे तथा अच्छी फसल हो,इसके लिए पूजा की जाती है। यह पर्व भाई बहन के स्नेह का भी पर्व है। बहनें अपने भाईयों की सुख-समृद्धि के लिए करम देव की पूजा करती हैं और सरना पर्व कम और धर्म के बीच समन्वय स्थापित कर चलने का संदेश देता है। कुछ दशक तक करमा पर्व सादगी से मनाया जाता था, पर पिछले कुछ वर्षां से करमा पर्व धूमधाम और रौनक के साथ मनाया जाना लगा है। विभिन्न सरना समिति और मुहल्लों में होने वाली पूजा के दौरान पूजा स्थल की सजावट में क्रिएटिविटी भी देखने को मिल रही है और आसपास विद्य्नुत साज-सज्जा की जाती है। पूजा स्थलों को अब फूलों व पत्तियों के अलावा रंगीन झाड़ियों, बैलून आदि से सजाया जाने लगा है। हालांकि पर्व के मूल अर्थात पूजन पद्धति में कोई बदलाव नहीं आया है और यह पूरी तरह से पारंपरिक तरीके और रीति-रिवाज के साथ मनायी जाती है।

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