अब कृत्रिम घोसलें पक्षियों को देंगे एक नया आशियाना

रांची,2नवंबर। जंगल व पहाड़ों से आच्छादित चतरा जिला में एक बार फिर से विलुप्त हो रहे पक्षियों की चहचाहट सुनी जा सकेगी। जिले में पक्षियों को बसाने के लिये एक अनोखा व अद्भूत प्रयोग जो किया जा रहा है। दरअसल चतरा जिलें के जंगलों में पक्षियों के लिये पेड़ों पर पहली बार कृत्रिम घोसलें लगाये जा रहे हैं। दुर्लभ प्रजाति के गरुड़ पक्षियों के लिये विशेष रुप से तैयार घोंसला लगाया जायेगा। दक्षिणी वन प्रमंडल अधिकारी मधुकर ने बताया कि पक्षियों की सुरक्षा तथा उन्हें बसाने का यह एक अनूठा प्रयास है और काफी उत्साहवर्धक भी है।
चतरा जिला का तकरीबन 55 फीसदी भूभाग वनों से भरा-पड़ा है। लेकिन पिछले दो दशकों से वनों की अंधा-धूंध कटा तथा अधौगिकीकरण की वजह से दुर्लभ प्रजातियों के पक्षियों की संख्या में लगातार गिरावट आ रही है। बतातें हैं भारत सरकार के इस महत्वाकांक्षी योजना को धरातल पर उतारकर जिले में पक्षियों को बसाने की कवायत शुरु की गयी है। चतरा जिलें में में शुरुआती तौर पर 425 कृत्रिम घोंसला लगाये जा रहे हैं।
गौरतलब है कि चतरा जिला में विलुप्त हो रहे गरुड़ पक्षियों का भी बसेरा है इसके अलावे पाराकीट, गौरेया, तोता, मैना व कोयल समेत कई अन्य प्रजातियों के पक्षिओं की भी संख्या बहुतायत में पायी जाती है। इन्हीं पक्षियों की सुरक्षा को लेकर पेड़ों पर कृत्रिम घोंसला लगाये जा रहे हैं। दक्षिणी वन प्रमंडल पदाधिकारी मधुकर बतातें हैं कि कृत्रिम घोंसला लग जाने से पक्षियों को फिर से अपना आशियाना मिलेगा और पक्षियां फिर से बसने लगेगी। उन्होंने बताया कि लकड़ी से इन घोसलों को तैयार किया गया हैद्य्न उसे उन्हीं स्थानों पर लगाया जाता है जहां पक्षियां पायी जाती है। उन्होंने बताया कि सिमरिया अंचल के बड़गांव में दुर्लभ प्रजाति के गरुड़ पक्षी भी मिलते हैं जिनके लिये बड़ा घोंसला बनाया गया है।
दूसरी ओर एक स्थानीय व सामाजिक कार्यक्रता अजय सिंह का कहना है चतरा जिला में पक्षियों के लिये कृत्रिम घोंसला लगाया जाना उनकी संरक्षा की ॰ष्टिकोण से काफी अच्छा प्रयास है और विलुप्त हो रहे पक्षियों को बसाने का यह एक अनूठा व काफी सराहनीय कदम है।
दरअसल चतरा जिलें में पिछले दो दशकों से जंगलों की अवैध कटा , पत्थर उत्खनन, उच्च शक्ति के ट्रांसमिशन लाइन व अधौगिकीकरण आदि में काफी इजाफा हुआ है। इसके कारण पक्षियों के अस्तित्व पर मंडरा रहे खतरे से निजात पाने तथा पर्यावरण व पक्षियों की सुरक्षा और उन्हें एक बार फिर से बसाने के लिये वन विभाग द्वारा की जा रही यह पहल संभवतः काफी कारगर साबित हो सकेगा, ऐसा माना जा रहा है।

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