पंचपरगनिया क्षेत्र की सदियों पुरानी संस्कृति की झलक“टुसु परब“    

रांची,13जनवरी ।वर्ष की शुरुआत में जब दक्षिणी गोलार्द्ध में मकर रेखा में आ जाता है, जिसके फलस्वरुप ग्रीष्म ऋतु का आगमन तथा शीत अयनांत होता है। दिन-रात एवं ऋतु परिवर्तन पृथ्वी का अपनी अक्षतल से साढ़े तेईस डिग्री झुके होने के कारण होता है। यह पृथ्वी का कठोर सच है। इसी से स्वर्ग की आभामय प्रतिविम्ब हमारी हरी-भरी धरती पर दिखाई देता है। जैसे ही वर्ष का आगमन होता है तो हमारे सामने मकर संक्रांति जैसे पवित्र त्योहार से होता है। वैसे तो यह त्योहार पूरे भारत वर्ष में मनाया जाता है, लेकिन झारखण्ड में मकर संक्रांति का स्वागत का रुप ही अलग है। यहां मकर संक्रांति की शुरुआत होते ही टुसु पर्व की याद आती है। यह सबसे अधिक पांचपरगना (तमाड़, बुण्डू, सिल्ली, राहे, वारेन्दा) क्षेत्र में देखने को मिलता है। जिसमें आदिवासी एवं सदान बिना भेद-भाव के टुसू पर्व एक साथ मनाते हैं। इसमें किसी प्रकार की कोई पूजा-पाठ नहीं होती है। सुबह होते ही स्नान कर सूर्य देव का दर्शन किया जाता है और मंगलमय जीवन की कामना करते हैं। स्नान के पश्चात् नए वस्त्र पहन कर दही चुड़ा, तिलकुट तथा एक विशेष प्रकार की “गुड़पिठा“ का सेवन करते हैं। पंचपरगना क्षेत्र में गुड़पीठा का एक महत्वपूर्ण स्थान है, चूंकि यह सभी के घर बनता है। अरवा चावल को ढेंकी (चावल कुटने वाला) से (वर्तमान में मशीन से) पिसने के पश्चात गुड़ मिलाकर पकवान बनाते हैं। कुटुम्ब-बन्धु, सगे-सम्बधी एवं परिचितों के घर गुड़पीठा का आदान-प्रदान होता है। इसी बहाने से लड़का-लड़की देखते हैं तथा शादी-विवाह की बात शुरु होती है।
  इस पर्व का महत्व तब और भी बढ़ जाता है जब हमें पता चलता है कि अन्य राज्यों की भांति हमारे राज्य के पांचपरगना क्षेत्र में भी एक विशेष प्रकार का “फोदी खेल“ (डंडे एवं लकड़ी का बनाया हुआ गेंद से) खेला जाता हैं। इस दिन प्रत्येक गाँव के मानकी, मुण्डा एवं सदान मिलकर खेलते हैं। इसके लिए दो या दो से अधिक गांव का दो दल बनाया जाता है और खेल की शुरुआत हो जाती है। खेल का निर्णय हार और जीत से तय होती है, लेकिन कोई पुरस्कार देने की परम्परा नहीं है। जीत से ही गांव की प्रतिष्ठा आंकी जाती है। इस खेल में खिलाड़ियों की संख्या एवं उम्र की कोई सीमा नहीं होती है। सभी खलने वाले डंडे लेकर दो गांव के बीच सीमा में प्रारम्भ करते हैं तथा वे अपने गांव की ओर “फोदी“ (लकड़ी के गेंद) को लाने का भरसक प्रयास करते हैं। इसमें दो व्यक्ति ही एक साथ फोदी का मारने की प्रथा है, चूंकि अधिक होने पर डंडे से लगने का डर है। दोनों पक्ष के किसी दो व्यक्ति (गेंद मारने वाले) में से एक के द्वारा गेंद को ऊपर फेंकते हैं तथा एक साथ मारते हैं। जिस किसी का भी डंडे से फोदी पर प्रहार हो जाए। अगर फोदी को कोई पकड़ लेता है तो वह भागते हुए डंडे से फोदी को अपने सीमा क्षेत्र की और मारने लगता है, जबतक कि विपक्ष दल उसको डंडे से छु न ले। यह क्रिया चलते रहती है। जब तक कि फोदी गांव के अपनी सीमा के अन्दर में न आ जाए। हार जीत का निर्धारण इसी से होता है। खेल के दौरान जीतने वाले दल बीच-बीच में ?हॉबाबा’ (ललकारने की आवाज) करते हैं। खेल समाप्त होने के बाद गांव के अपने दल के खिलाड़ी खेलते हुए गांव के मालिक (मानकी, मुण्डा) के घर में लगे ’ढेंकी’ (चावल कुटने वाला) में फोदी को कुटने के पश्चात् मालिक को सौंप देते हैं। खेलने वाले सभी सदस्यों का पैर धोया जाता है। ठंडा इस समय चरम सीमा पर होने के कारण गांव देहातों में आग जलाकर गोलाकार बैठकर गुड़पीठा के साथ हंड़िया का सेवन करते हैं। इस समय अनेक लोककथा सुनाई जाती है। सभी हंसी, मजाक, आनन्द से मिलने के बाद जोहार के साथ अन्त कर अपने-अपने घर चले जाते हैं। लेकिन आज इस खेल के सामने वजूद का संकट है।
 पूस परब में लोगों को नए वस्त्र और खाने-पीने की वस्तुओं की पूर्ति करने कोई कठीनाई नहीं है। इस समय लोग धान काट कर खलिहान में ला कर घर के अन्दर सुरक्षित रखकर निश्चित हो जाते हैं। सभी के पास अन्न और पैसे का अभाव नहीं खटकता है। इसमें डॉ. करम चन्द अहीर का एक कविता है-
“पूस परब टा काहे आवेला,
नावा लूगा, मास-पीठा देला।“
     इस परब में अन्य क्षेत्र के लोगों के मकर सं ांति मनाने और यहां के लोगों के मकर एक और फर्क दिखता है, वह है “टुसु“ या “चौड़ल“ और टुसु गीतों के साथ मेलों का आयोजन। टुसु गीत तो पांचपरगना के लोगों के लिए इतना प्रिय और सहज है कि मेला आने-जाने वालों के मुख से टुसु गीत उदगार मुखरित होते दिखाई देते हैं। जैसे-  झुंड से मेला देखने जाने वाली महिलाओं को अगर कोई साईकिल चलाने वाला दिख जाए तो महिलाओं के मुख से इस प्रकार की व्यंगात्मक गीत निकलती है-
“तोर साईकिल टा हेंडेल बांका,
साईकिल टा हेंडेल बांका
कोन दोकाने लिले रे बोका।“
जवाब में साईकिल सवार गाता है-
“तुंई बोलिस ना फोटर-फोटर,
बोलिस ना फोटर-फोटर
तोर दुआरे चालाबो मोटर।“
कोई बाहर पढ़ने वाला विद्य्नार्थी, अन्यत्र नौकरी करने वाले या मजदुर करने वाला मकर में जब घर आने लगता है तो उसके कंठ से स्वतः गीत निकलते हैं-
“चल जाबी तो आमार सहरे,
तोके लेइजबो कोतो लहरे,
चल जाबी तो मकर परबे।“
    इस प्रकार से मकर संक्रांति/टुसु पर्व की जिज्ञासा, उसकी तैयारी, जीवन के मरुस्थल में पर्व की हरियाली, उल्लास के साथ पर्व का अभिनन्दन में, मेले की तैयारी, गीत और नृत्य के रुप में पर्व का वरदान “टुसु परब“ है। इसमें फोदी खेल और गुड़पिठा का पांचपरगना क्षेत्र में महत्वपूर्ण एवं सर्वोपरि स्थान है।
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