लालू प्रसाद के खिलाफ चौथे मामले में फैसला आज

राजद अध्यक्ष की याचिका पर तत्कालीन एजी समेत तीन को समन
रांची,16मार्च। अरबों रुपये के बहुचर्चित चारा घोटाले के दुमका कोषागार से तीन करोड़ रुपये से अधिक अवैध निकासी से जुड़े आरसी 36ए/96 में सीबीआई की विशेष अदालत शनिवार 17मार्च को फैसला सुनाएगी।
राजद प्रमुख के अधिवक्ता प्रभात कुमार ने बताया कि इस मामले मे लालू प्रसाद समेत सभी 31 आरोपियों को कल सशरीर कोर्ट में उपस्थित रहने का आदेश दिया है। उन्होंने बताया कि आज अदालत ने यह पूछा कि आरसी 36ए/96 मामले में किसी आरोपी की कोई याचिका लंबित है या नहीं, इस पर सभी आरोपियों के अधिवक्ताओं ने बताया कि कोई याचिका लंबित नहीं है, जिसके बाद कोर्ट ने फैसला के लिए 17 मार्च की तिथि निर्धारित की है। उन्होंने यह भी कहा कि कल दोपहर बाद फैसला सुनाये जाने की संभावना है।
लालू प्रसाद के एक अन्य अधिवक्ता अनंत कुमार ने बताया कि अदालत ने यह माना है कि एजी समेत तीनों अधिकारियों की मामले में भूमिका संदेह के घेरे में है। उन्होंने बताया कि अदालत ने एकीकृत बिहार के तत्कालीन महालेखाकार पीके मुखोपाध्याय, उप महालेखाकार बीएन झा और सीनियर डायरेक्टर जनरल प्रमोद कुमार के खिलाफ समन जारी किया है। अदालत ने इस मामले में आगामी 16 अप्रैल तक संबंधित प्राधिकार से अभियोजन स्वीकृति का आदेश प्राप्त करने को कहा है।
इससे सीबीआई के विशेष न्यायाधीश शिवपाल सिंह की अदालत ने विगत 5 मार्च को दुमका कोषागार से अवैध निकासी से जुड़े मामले में सुनवाई करते हुए 15 मार्च को फैसले की तिथि निर्धारित की थी। लेकिन राजद अध्यक्ष की ओर से अंतिम क्षणों में दायर की गयी याचिका पर सुनवाई के कारण फैसले की तिथि बढ़ानी पड़ी।
गौरतलब है कि लालू प्रसाद के अधिवक्ता की ओर से दायर याचिका में एकीकृत बिहार के महालेखाकार रहे पीके मुखोपाध्याय, उप महालेखाकार बीएन झा और सीनियर डायरेक्टर जनरल प्रमोद कुमार को भी आरोपी बनाने के लिए सीआरपीसी की धारा 319 के तहत नोटिस जारी करने का अनुरोध किया गया था। लालू प्रसाद के अधिवक्ता की ओर से अदालत में यह तर्क दिया गया था कि तत्कालीन अपर वित्त सचिव शंकर प्रसाद जांच के लिए रांची आये थे, उन्होंने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि खर्च का ब्यौरा एजी को भेजा रहा है, लेकिन देवघर के जिला पशुपालन पदाधिकारी मासिक खर्च की रिपोर्ट निर्देशालय को नहीं भेज रहे है। लालू के वकील ने बताया कि एजी ने एक बार भी बिल की जांच नहीं की, अगर जांच की होती, तो फर्जी निकासी का मामला पकड़ा जाता। एजी ने वित्तीय वर्ष 1991-96 की अवधि में जो रिपोर्ट पेश की, उसमें बजट के मुकाबले अधिक व्यय की बात कही, लेकिन एजी ने कभी फर्जी निकासी की बात नहीं कही। सभी रिपोर्ट तत्कालीन एजी पीके मुखोपाध्याय, उप महालेखाकार बीएन झा और सीनियर डायरेक्टर जनरल प्रमोद कुमार के हस्ताक्षर से जारी की गयी थी, इसलिए इन अधिकारियों को भी अभियुक्त बनाने की मांग की गयी थी।

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