चेचक जैसी महामारी के खिलाफ चलाया था व्यापक अभियान
रांची। केंद्रीय कैबिनेट ने आगामी 15 नवंबर को भगवान बिरसा मुंडा (Bhagwan Birsa Munda)की जयंती को “जनजातीय गौरव दिवस“ के तौर पर मनाया जाएगा। भगवान बिरसा मुंडा की गिनती ना सिर्फ एक स्वतंत्रता सेनानी के रूप में होती है, बल्कि वे एक बड़े समाज सुधारक भी थे।
रांची विश्वविद्यालय के सहायक प्रो0 डॉ0 राजकुमार ने एनबीटी ऑनलाइन से विशेष बातचीत में कहा कि भगवान बिरसा मुंडा के पूरे जीवन काल को दो भागों में विभक्त कर देखा जाता है। अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने के पहले बिरसा मुंडा की पहचान मुंडा बहुल खूंटी के इलाके में एक समाज सुधारक के रूप में थी। 1875 में जन्मे बिरसा मुंडा की ख्याति वर्ष 1891 तक दूर-दूर तक एक समाज सुधारक के रूप में हो गयी और उन्होंने उस वक्त चेचक महामारी के दौरान लोगों से साफ-सफाई का ख्याल रखने की अपील की, जिससे इलाके में महामारी का प्रकोप कम हो गया। ईसाई मिशनरियों के प्रभाव को कम करने के लिए बिरसा मुंडा ने बिरसाईत धर्म की भी शुरुआत की। इस दौरान वे जिस गांव में जाते थे, साफ-सफाई का विशेष ख्याल रखा जाता था, जिस कारण उनके गांव पहुंचते ही बीमारी का प्रकोप कम हो जाता था, इससे उनकी ख्याति भगवान के रूप में फैलती गयी।
डॉ0 राजकुमार ने बताया कि समाज सुधारक के साथ ही भगवान बिरसा मुंडा ने ब्रिटिश सरकार के शोषण को देखते हुए अपने मुंडा समाज को भी सशस्त्र तरीके से एकजुट करने का प्रयास शुरू किया, तो अंग्रेजों के होश उड़ गये।

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