वन उत्पादकता संस्थान ने विकसित की बांस की दर्जनों उन्नत प्रजातियां
रांची। ग्रीन गोल्ड (Green Gold,) के नाम से मशहूर बांस जन्म से लेकर मृत्यु तक का साथी है। रांची (ranchi) स्थित वन उत्पादकता संस्थान ने बांस की दर्जनों उन्नत किस्म की प्रजातियां विकसित की है, जिसके माध्यम से किसान ना सिर्फ आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो सकते हैं, बल्कि बांस और बेंत का व्यवसाय विकसित होने से बड़ी संख्या में युवाओं को रोजगार मिल सकता हैं।
2017 में वृक्ष प्रजाति से हटाकर घास की प्रजाति में शामिल
संस्थान के निदेशक और देश के वरिष्ठतम वैज्ञानिकों में से एक डॉ0 नितिन कुलकर्णी ने बताया कि वर्ष 2017 में केंद्र सरकार ने कुछ वर्ष पहले ही बांस को वृक्षों की प्रजाति से हटाकर घास की प्रजाति में शामिल कर लिया है, ताकि लोगों की सभी कठिनाईयां दूर हो सके। पूर्व में जब बांस की खेती को लेकर जब लोगों को प्रोत्साहित किया जाता था, तो पेड़ की श्रेणी में शामिल होने के कारण परिवहन में वन कानून की बाधाएं भी सामने आती थी और इसके लिए पहले अनुमति लेने की जरुरत होती थी। परंतु अब इसे वृक्ष प्रजाति से निकाल कर घास की प्रजाति में शामिल करने से सारी अड़चने दूर हो गयी हैं।
झारखंड में बांस की 12 प्रजातियांं की बहुलता
झारखंड में मुख्य रूप से बांस की 12 प्रजातियां पायी है। वन उत्पादकता संस्थान की ओर से ना सिर्फ इनकी गुणवत्ता में सुधार की दिशा में पहल किया जा रहा है, बल्कि किसानों को प्रशिक्षण देने और उन्हें बीज या पौधे उपलब्ध कराने की दिशा में भी निरंतर काम किया जा रहा हैं।
30 से 70 साल में निकलते है बीज
देश में बांस की सैकड़ों प्रजातियां पायी जाती है और बांस की बीज की उपलब्धता काफी कम होती हैं, क्योंकि 30 से 70वर्षां में सिर्फ एक बार बांस से बीज निकलते हैं और जैसे ही बांस से बीज निकल जाता हैं, वह बांस सूख जाता हैं। ऐसी स्थिति में बांस की उन्नति के लिए बांस की कटिंग कर उसमें आईबीए-एनए ट्रिटमेंट देकर उसे जमीन में लगाकर बांस के पौधे तैयार किये जाते हैं।

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