October 22, 2021

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138 साल बाद भी प्रतिमा निर्माण के लिए मंगायी जाती है बंगाल से गंगा की मिट्टी

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मूर्तिकार, ढाक पार्टी और पुजारी हर साल बंगाल से आते है, प्रतिमा का विर्सजन भी अलग अंदाज में
रांची। दुर्गा पूजा की शुरुआत सांस्कृतिक भूमि मानी जाने वाली बंग भूमि अर्थात बंगाल से हुई थी और कोलकाता के बाद रांची में सबसे अधिक भव्य तरीके से दुर्गात्सव मनाया जाता है। बांग्ला संस्कृति और परंपरा के अनुरूप रांची के दुर्गाबाटी में सबसे पहले 1883 में दुर्गा पूजा की शुरुआत हुई थी और 138साल बाद आज भी उस परंपरा का निर्वाह किया जा रहा है।
प्रतिमाएं एक ही नाप की
दुर्गाबाटी में परंपरागत तरीके से पूजा-अर्चना और साज-सज्जा की जाती है। यहां की एक और खासियत यह है कि दुर्गाबाटी की प्रतिमाएं एक ही नाप (एक चाला) की होती है। प्रतिमा का निर्माण पुरुलिया और कोलकाता के मूर्तिकार करते हैं। प्रतिमा के लिए बंगाल से ही गंगा की मिट्टी मंगायी जाती है और बांग्ला रीति-रिवाज के साथ पूजा कराने के लिए भी बंगाल से ही पुजारी आते हैं।
झोपड़ी में मां की पूजा शुरू हुई, मंदिर के लिए जमीन दान दी
दुर्गाबाटी पूजा समिति के सदस्य बताते है कि देश की आजादी के पहले जिला स्कूल के शिक्षक गंगाचरण वेदांत बागीश और समाज के लोगों ने मां दुर्गा की पूजा करने का निर्णय लिया। सबसे पहले अल्बर्ट एक्का चौक के निकट स्थित झोपड़ी में मां की पूजा शुरू हुई। बाद में ज्योति प्रसाद सिंहदेव ने समाज की जमीन दान दी। जमीन मिली, तो 1883 में बंगाली समाज के लोग दुर्गाबाटी (मंदिर) की स्थापना कर मां की पूजा करने लगे।
विजयादशमी के दिन सिंदूर खेला की प्रसिद्धि दूर-दूर तक
दुर्गाबाटी में आज भी बांग्ला रीति-रिवाज से पूजा होती है, मूर्तिकार, ढाक पार्टी और पुजारी हर साल बंगाल से आते है। पहले यहां बलि देने की भी परंपरा थी, जिसे 1927 के बाद खत्म कर दिया गया। दुर्गा बाड़ी में दशमी को होने वाला सिंदूर खेला काफी प्रसिद्ध हैं। प्रतिमा का विसर्जन भी अलग तरीके से किया जाता है। मां की प्रतिमा को कंधे पर रखकर तालाब किनारे ले जाता है।