August 12, 2022

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झारखंड के जंगलों में पायी जाति हैं दुर्लभ प्रजाति की तितलियां

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वायु प्रदूषण कम होने से तितलियों की संख्या में हुआ जबर्दस्त इजाफा, विलुप्त होने के कगार पर पहुंची प्रजातियों की संख्या भी बढ़ी
रांची। तितलियां पर्यावरण की सबसे अच्छी इंडिकेटर होती है। हाल के कुछ वर्षाें में झारखंड में पर्यावरण पारिस्थितिकी ( एनवायरनमेंट इकोलॉजी) में काफी सुधार हुआ है। दो-ढ़ाई वर्षाें में झारखंड के जंगलों में तितलियों की कई ऐसी प्रजातियों की संख्या में भी बढ़ोत्तरी देखी गयी है, जो लंबे समय से प्रदूषण के कारण विलुप्त होने के कगार पर थीं, इनकी तादाद बढ़ने का अर्थ है कि हाल के महीनों में पर्यावरण को काफी फायदा हुआ है।
तितलियों की प्रजाति पर लंबे समय से अध्ययन कर रहे युवा वैज्ञानिक और सेंट्रल सिल्क बोर्ड खरसावां स्थित बीएसएमटीसी के प्रभारी डॉ0 तिरुपम रेड्डी ने कहा कि उन्होंने झारखंड में तितलियों की करीब 90 प्रजातियों के बारे में अध्ययन करने का काम किया है। इनकी एक सबसे खूबसूरत प्रजाति ‘सफ्फुज्ड स्नो फ्लैट’ भी देखी गयी है। इसे शंख जिरानी के नाम से भी जाना है। इसके अलावा ग्रासलैंड, वुडलैंड, पायनियर, ब्लू जे, ब्लू मोर्मन, वाइट मोर्मन, साउथ बर्डविंग, ट्री निम्फ और अंडमान क्रो प्रजाति की तितलियों की संख्या में अच्छी बढ़ोत्तरी हुई है। इन सबसे अलग यहां कोल्हान के जंगल में सबसे बड़े आकार की ब्लू मोर्मन तितली बड़े पैमाने पर मिल रही है, जो लोगों को मंत्रमुग्ध कर रही है।
युवा वैज्ञानिक डॉ. रेड्डी पिछले तीन वर्षाें से लगातार इन तितलियों पर अनुसंधान और शोध का काम कर रहे है और अब तक वे अपने कैमरे से 90 से अधिक प्रजातियों को कैमरे में कैद कर चुके है। वे हर माह तितलियों के पर्यवेक्षण पर 70 घंटे खर्च करते है। उनका कहना है कि तितलियों की संख्या बढ़ने से यह साफ हो जाता है कि कोरोना काल के बाद से झारखंड में एनवायरनमेंट इकोलॉजी में जो सुधार हुआ है, उसे बनाये रखने की दिशा में अब और अधिक कारगर कदम उठाये जाने की जरूरत है।

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